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Kallu Kumhaar Ki Unnkoti

Class 9th Hindi संचयन भाग 1 CBSE Solution
Exercise
  1. ‘उनाकोटी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है?…
  2. पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए?…
  3. कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया?
  4. ‘मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई’- लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है?…
  5. त्रिपुरा ‘बहुधार्मिक समाज’ का उदाहरण कैसा बना?
  6. टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज कल्याण के कार्यों…
  7. कैलासशहर के जिलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी?…
  8. त्रिपरा के घरेलू उद्योगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलु उद्योगों के…

Exercise
Question 1.

‘उनाकोटी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है?


Answer:

उनाकोटी का अर्थ है ' एक कोटि' , यानी एक करोड़ से एक कम। दंतकथा के अनुसार उनाकोटी में शिव की एक कोटि से एक कम मूर्तियां हैं। कहा जाता है कि जब कल्लू कुम्हार ने माता पार्वती के साथ कैलाश पर चलने की जिद की तो भगवान् शिव जी ने कल्लू कुम्हार से पीछा छुड़ाने के लिए उसे उनकी एक करोड़ मूर्तियां एक रात में बनाने का कहा। कुल्लू कुम्हार ने शिव की मूर्तियाँ बनाई लेकिन वे एक करोड़ से एक कम निकली| विद्वानों का मानना है कि यह जगह दस वर्ग किलोमीटर से कुछ ज्यादा इलाके में फैली है और पाल शासन के दौरान नवी से बारहवीं सदी तक के तीन सौं वर्षों में यहाँ चहल - पहल रहा करती थी।



Question 2.

पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए?


Answer:

उनाकोटी में स्थित एक विशाल चट्टान ऋषि भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण की कथा को व्यक्त करती है। गंगा अवतरण के धक्के से कहीं पृथ्वी धंसकर पाताल लोक में न चली जाए, इसके लिए ऋषि भगीरथ ने भगवान् शिव जी से प्रार्थना करी कि वह गंगा जी को अपनी जटाओं में लेलें और उसके बाद गंगा जी को धीरे - धीरे धरती पर प्रवाहित करें। भगवान् शिव जी का चेहरा पूरी चट्टान पर बना हुआ है और उनकी जटाएं दो पहाड़ों पर फैली हुई है। भारत में यह भगवान् शिव जी की सबसे बड़ी आधार-मूर्ति है।



Question 3.

कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया?


Answer:

उनाकोटी में पहाड़ों को काटकर विशाल आधार-मूर्तियां बनी हुई हैं। स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि इन मूर्तियों का निर्माता कल्लू कुम्हार था। वह माता पार्वती जी का भक्त था। माता पार्वती और भगवान् शिव जी के साथ उनके निवास कैलाश पर जाना चाहता था। भगवान् शिव जी इसके लिए राज़ी नहीं थे लेकिन माता पार्वती जी के जोर देने पर वह उनको ले जाने के लिए राज़ी हो गए। इसके लिए उन्होंने कल्लू कुम्हार से एक शर्त रखी कि उसे एक रात में उनकी एक करोड़ मूर्तियां बनानी होगी। कल्लू कुम्हार इसके लिए राजी हो गया और अपने काम पर जुट गया। लेकिन जब सुबह हुई तो मूर्तियां एक करोड़ से एक कम निकली। इसलिए भगवान् शिव जी ने कल्लू कुम्हार को अपनी मूर्तियों के साथ उनाकोटी में ही छोड़ दिया और माता पार्वती जी के साथ कैलाश चले गए।



Question 4.

‘मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई’- लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है?


Answer:

त्रिपुरा के हिंसाग्रस्त मुख्य मार्ग में प्रवेश करने से पहले लेखक टीलियामुरा गया। राष्ट्रीय राजमार्ग - 44 पर अगले 83 किलोमीटर यानि मनु तक की यात्रा के दौरान ट्रैफिक सी.आर.पी.एफ की सुरक्षा में काफिलों की शक्ल में चलता है। मुख्य सचिव और आई.जी., सी. आर.पी.एफ से मैंने निवेदन किया था कि वे हमें घेरेबंदी में चलने वाले काफिले के आगे - आगे चलने दे। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे इसके लिए तैयार हो गए लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि मुझे और मेरे कैमरामैन को सी.आर.पी.एफ की हथियारबंद गाडी में चलना होगा और हमें शूटिंग अपने जोखिम पर करनी होगी। लेखक अपनी शूटिंग में इतना व्यस्त था कि उसे वहां पर कोई डर महसूस ही नहीं हुआ। फिर जब उनको सुरक्षा प्रदान कर रहे सी.आर.पी.एफ के एक जवान ने पहाड़ियों पर रखे दो पत्थरों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दो दिन पहले उनका एक जवान यहाँ विद्रोहियों द्वारा मार डाला गया था, यह सुनकर लेखक की रीढ़ में एक झुरझुरी - सी दौड़ गयी और शेष यात्रा में वह यह ख्याल अपने दिल से नहीं निकाल पाया कि हमें घेरे हुए शांतिपूर्ण दिखाई देने वाले जंगलों में बन्दूक लिए विद्रोही भी छिपे हो सकते है।



Question 5.

त्रिपुरा ‘बहुधार्मिक समाज’ का उदाहरण कैसा बना?


Answer:

त्रिपुरा में लगातार बाहरी लोगों के आने से कुछ समस्याएँ तो पैदा हुई है लेकिन इसके चलते यह राज्य बहुधार्मिक समाज का उदाहरण भी बना है। त्रिपुरा में उन्नीस अनुसूचित जनजातियों और विश्व के चारों बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व मौजूद है। अगरतला के बाहरी हिस्से पैचारथल में लेखक ने एक सुन्दर बौद्ध मंदिर देखा। लोगों से पूछने पर लेखक को पता चला कि त्रिपुरा के उन्नीस कबीलों में से दो , यानी चकमा और मुघ महायानी बौद्ध हैं। ये कबीले त्रिपुरा में बर्मा या म्यांमार से चटगांव के रास्ते आये थे। दरअसल इस मंदिर की मुख्य बुद्ध प्रतिमा भी 1930 के दशक में रंगून से लायी गयी थी ।



Question 6.

टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज कल्याण के कार्यों में उनका क्या योगदान था?


Answer:

टिलियामुरा कस्बे में लेखक की मुलाकात सबसे पहले हेमंत कुमार जमातिया से हुई। हेमंत कुमार एक प्रसिद्ध लोकगायक हैं। जो 1996 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी हो चुके हैं। जवानी के दिनों में वे पीपुल्स लिबरेशन आर्गनाइजेशन के कार्यकर्ता थे। इसके बाद लेखक की मुलाकात एक और गायक मंजु ऋषिदास से हुई। ऋषिदास मोचियों के एक समुदाय का नाम है। मंजु ऋषिदास आकर्षक महिला थीं और रेडियो कलाकार होने के अलावा नगर पंचायत में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व भी करती थीं। वे निरक्षर थीं। नगर पंचायत को वे अपने वार्ड में नल का पानी पहुंचाने और इसकी मुख्य गलियों में ईंटें बिछाने के लिए राजी कर चुकी थीं।



Question 7.

कैलासशहर के जिलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी?


Answer:

जब लेखक कैलासशहर पहुंचा तो उनकी मुलाकात वहां के जिलाधिकारी से हुई। यहां जिलाधिकारी ने लेखक को बताया कि आलू की बुआई के लिए आमतौर पर पारंपरिक आलू के बीजों की जरूरत दो मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पड़ती है। इसके बरक्स टीपीएस की सिर्फ 100 ग्राम मात्रा ही एक हेक्टेयर की बुआई के लिए काफी होती है। त्रिपुरा से टीपीएस का निर्यात अब न सिर्फ असम, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, बांग्लादेश, मलेशिया और वियतनाम को भी किया जा रहा है। इसके अलावा कलेक्टर ने अपने एक अधिकारी को लेखक को मुराई गांव ले जाने को कहा, जहां टीपीएस की खेती की जाती थी।



Question 8.

त्रिपरा के घरेलू उद्योगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलु उद्योगों के विषय में बताइए?


Answer:

त्रिपुरा में आलू की खेती मुख्य रूप से की जाती थी। इसके अलावा वहां घरेलू गतिविधियों में अगरबत्ती बनाना, बांस के खिलौने, गले की माला आदि चीजें तैयार की जाती हैं। अन्य घरेलू उद्योगों में कपड़े सिलना, सिलाई—बुनाई करना, अगरबत्ती के डिब्बे तैयार करना, माचिस और साबुन बनाने का काम होता है। भारत के कई जिलों और राज्यों में महिलाएं इस तरह के घरेलू काम कर अपना गुजारा करती हैं। ऐसे कामों में मेहनत ज्यादा और आमदनी कम होती है। जो महिलाएं पढ़ी—लिखी नहीं होतीं उन्हें मजबूरी में ये काम करना पड़ता है। कई बार महिलाओं को अच्छा मुनाफा भी मिलता है और वो खुद का काम भी शुरू कर लेती हैं।